कोलकाता : राज्य निर्वाचन आयोग (एसईसी) के साढ़े सात बजे के आंकड़ों के मुताबिक, ग्राम पंचायत की 63 हजार 229 सीटों में से 27 हजार 985 सीटों के परिणाम आ चुके हैं. इसमें से 18 हजार 606 टीएमसी जीत चुकी है. पार्टी 8 हजार 180 पर आगे चल रही है. वहीं बीजेपी 4 हजार 482 सीट पर सिमट गई है और 2 हजार 419 पर आगे चल रही है.
चुनाव आयोग के मुताबिक, लेफ्ट फ्रंट ने 1502 सीटों पर जीत दर्ज की है. वह 969 सीटों पर आगे चल रही है. वहीं कांग्रेस 1 हजार 73 सीटें अब तक जीत चुकी है और 693 पर आगे चल रही है. अन्य पार्टियां 476 सीटें जीत चुकी है तो 208 पर आगे चल रही है. निर्दलीय उम्मीदवार 1 हजार 60 सीटों पर जीत हासिल कर चुके हैं और 466 पर आगे चल रही है.
पंचायत समिति में कौन आगे?
पंचायत समिति में टीएमसी 118 सीट जीत चुकी है तो 782 पर आगे चल रही है. बीजेपी का अभी तक खाता नहीं खुला और वो 79 सीटों पर आगे चल रही है. वहीं सीपीआईएम एक सीट पर जीत कर चुकी है तो 27 सीट पर आगे चल रही है. कांग्रेस आठ सीट पर आगे चल रही है. चुनाव पंचायत समिति की 9 हजार 728 सीटों पर हुए हैं. बची हुई सीटों पर गिनती चल रही है.
जिला परिषद में किसे बढ़त मिली?
चुनाव आयोग ने बताया कि घोषित किए गए 18 जिला परिषद में टीएमसी सभी जीत चुकी है और 64 पर आगे चल रही है. वहीं सीपीआईएम दो सीटों पर आगे चल रही है. राज्य में 928 जिला परिषद सीटों के लिए इलेक्शन हुआ.
चुनावी हिंसा तो बंगाल की संस्कृति बन गई है
बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान 16 लोगों की मौत हुई थी और उसके बाद भी 9 हत्याएं हुई थीं। लोकसभा चुनाव 2019 के बाद भी 9 लोगों को जान गंवानी पड़ी थी। 2018 के पंचायत चुनाव में भी बंगाल में 23 लोग मारे गए थे। इससे पहले भी चुनावों में राजनीतिक हत्याएं होती रही हैं। नक्सलबाड़ी के लिए मशहूर बंगाल में राजनीतिक हत्याओं का इतिहास पांच दशक से ज्यादा पुराना है। 1971 में कांग्रेस के सिद्धार्थ शंकर रे के शासनकाल में शुरू हुआ हिंसा का दौर आज तक नहीं थमा। कांग्रेस के बाद सीपीएम, फिर टीएमसी सत्ता में आई। लंबे समय तक ज्योति बसु, बुद्धदेब भट्टाचार्य और ममता बनर्जी सीएम के तौर पर कुर्सी पर काबिज रहीं मगर इनके राज में हिंसा नहीं रुका। 2011 में वाम दलों का किला ढहा तब यह उम्मीद जताई गई कि ममता बनर्जी इस रक्तरंजित गाथा पर पूर्णविराम लगाएंगी, मगर ऐसा नहीं हुआ। ममता बनर्जी के शासनकाल में भी 12 साल से बंगाल चुनावों में लहूलुहान हो ही रहा है। एनसीआरबी के आंकड़े बताता हैं कि 10 साल के शुरुआती ममता राज में 150 लोग चुनावी हिंसा के शिकार हुए। अब तो चुनावी हिंसा भद्रलोक के बंगाल की संस्कृति बन गई है।